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नए युग के साथ डिजिटल होते रिश्ते।

नए युग के आगाज़ में आज रिश्तों के मायने भी डिजिटल होते जा रहे हैं।

हम सभी एक दूसरे के संपर्क में तो होते हैं। किंतु पास बैठ कर एक दूसरे के बारे में जानने का, दुःख सुख बाँटने का समय नहीं होता। रोज़ाना office से घर आने पर जो भी समय हमें मिलता है, उसे हम अपनी डिजिटल दुनिया को देना परिवार से अधिक महत्वपूर्ण रखते हैं।

यदि किन्ही कारणवश कोई दुर्घटना हो जाती है, तो हम सहायता करने की बजाय लोगों तक ये खबर पहुँचाने की होड़ में लग जाते हैं। क्यों जरूरी है हमारे लिए ये सब? क्यों हम इतने निर्मम हो चुके हैं कि हमें दूसरों के दर्द का भी एहसास नहीं होता? कुछ दिनों पहले की बात है।

मेरे घर के पास एक सज्जन के पिताजी का देहांत हो गया। सुबह के करीब 4 बजे उनका देहांत हुआ और उन्होंने करीब 5 बजे तक ये खबर social मीडिया पर डालते हुए पोस्ट कर दिया। सुबह अपना फोन check करने के दौरान मुझे यह पता चला की उनके पिताजी अब नहीं रहे। बाहर जा कर देखा तो उनका पार्थिव शरीर वहीँ पड़ा हुआ था। उस समय केवल एक ही सवाल आया की क्या सच में सोशल मीडिया पर पोस्ट डालना, उनके पिता को जिन्हें उस दिन के बाद वो केवल स्मृतियों में ही याद रख पाएंगे, को अंतिम विदाई देने से अधिक महत्वपूर्ण था?


मैं ये नहीं कहती की ऐसा करना गलत है। किंतु मेरे हिसाब से दुःख में व्यक्ति स्वयं को भी कुछ पल के लिए भूल जाता है, और खुद के साथ उसका सारा ध्यान अपनों को सँभालने में लग जाता है। ऐसे में फोन पर पोस्ट डालना याद रहना तो केवल यही दर्शाता है कि आपका फोन व्यक्ति के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया पर आप लिखते हो भावपूर्ण श्रद्धांजलि, किन्तु वास्तविकता में यहाँ कोई भाव तो दिखता ही नहीं है।

मेरे हिसाब से ऐसी स्थिति में हमें जरूरत है कुछ पल अपने परिवार के साथ बिताने की। उनका हाथ पकड़ उनके साथ होने का एहसास कराने की। क्योंकि रिश्ते और इंसान डिजिटल नहीं होने चाहिए।यदि हम कुछ समय के लिए online की दुनिया से बाहर आ कर अपने अपनों को देते हैं, तो हमारा अकेलापन कब खत्म हो जायेगा हमें एहसास भी नहीं होगा।


रिश्ता इंसानियत का।

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