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रिश्ता इंसानियत का।

मौत के बाद ज़िन्दगी को किसने देखा है।

दफन हो रहा या घिरा अग्नि की लपटों में,

मृत शरीर ये कहाँ जान पाया है।


किस धर्म के हो क्या मजहब है तुम्हारा ये क्यों जानना है?

रिश्ता तो ऊपरवाले ने बस इंसानियत का बनाया है।

हर मजहब ने सबका मालिक एक का ही हिसाब बताया है,

हर जान को उसने ही बनाया है।


माना अपना धर्म और अपना तरिका है इबादत का सबका,

फिर भी हाथ तो इबादत में सबने ऊपर ही उठाया है।

बात कुछ भी हो, सच्चे धर्म के पुजारी को लड़ना कहीं ना आया है।

मजहब के नाम पर अपनों के बहते लहू से भला कौन सा खुदा खुश हो पाया है।


अपना रिश्ता इंसानियत का है, हर इंसान में भगवान समाया है,

अपने पराये के दलदल से निकलकर तो देखो हर शक्श में उसी की छाया है।

हरपल में खुशियां है हरपल में ग़म ऐसा है सभी का संसार यहाँ,

भेदभाव की छाया छोड़ो, एक जैसा ही सबका सम्मान यहाँ।।

मजहब के नाम पर लड़ाइयाँ बन्द करो क्योंकि सबका है मान यहाँ।।

सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का, यही नाम ज़िन्दगी का।

                                                    (प्रिया मिश्रा)

प्रथा जातिवाद की।

प्रथा कुछ ऐसी चली जातिवाद की,

भेदभाव के श्रंगार की,

ह्रदय के बँटवारे की।

कट्टर होती नाम मजहब के,

मुस्लिम, ईसाई, सिक्ख, हिन्दू के नाम पर फैलते नारों की।

हर शहर हर डगर में होते विवाद की,

प्रथा कुछ ऐसी चली जातिवाद की।


ऊँच नीच फैलाने की,

व्यक्तियों के अपमान की,

बढ़ते आतंकवाद,

और हो रहे नरसंहार की।

लोगों के बीच फैली अनैतिकता,

इंसानों द्वारा इंसानो के ही दुर्व्यवहार की,

प्रथा कुछ ऐसी चली जातिवाद की।


कलंक हैं वो इंसानियत पर,

लगाया ना मरहम जिसने अपनों के ज़ख्मों पर।

 ईमान को भूल जो,

ऐसे जिए ऐसे ही मरेंगे पर बनेंगे नहीं इंसान वो।

इंसानियत नाम की चीज़ नहीं,

बनी ऐसी दुर्दशा है संसार की।

प्रथा ऐसी एक जातिवाद की।

लोगों को देखा मैंने रंग बदलते,

हिंसा फैला कर कटते और मरते।

आने वाला कल ना जाने कैसा होगा,

एकता की मिसाल और महान बनेगा या इस प्रथा की बलि चढ़ेगा।

प्रथा ही ऐसी बनी इस जातिवाद की,

सम्मान के लिए ही पैदा हुई कहानी असम्मान की।.  


                                       (प्रिया मिश्रा)

रिश्ता इंसानियत का।

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