सरसरी निगाहों से देखता निकल गया, आज फिर हाथों से रेत सा फिसल गया:- वक्त।

सरसरी निगाहों से देखता निकल गया,
आज फिर वक्त हाथों से रेत सा फिसल गया।

आज के वक्त को खुद मैं भी जाने देना चाहूँ,
पानी की तेजी से इसे स्वयं बहा देना चाहूँ।

कल वक्त रोकेंगे अपने समय पर,
जब मुस्कुरा कर मिलेंगे खुद से पलट कर।

जो मैं आज हूँ वो कल तो नहीं रहना है,
कल की तलाश में यूँ ही नहीं बहना है।

कुछ समय और चंद लम्हों की छड़ी है,
इंतज़ार खत्म बस इम्तहानों की घड़ी है।

जितना खुद से मिलना हुआ उतना इतराना आया,
अपने जीवन के नए अंदाज का फ़साना आया।

आज को याद कर कल खुद में गर्व करेंगे,
इंसान अलग हैं भई थोड़ा तो हट के चलेंगे।

वक्त की तलाश में वक्त से अजनबी भी ना रहेंगे,
जैसा चाहेंगे वैसा खुद में ढलेंगे,

क्योंकि वक्त किसी के पास ज़्यादा ना रहा,
जो है वो भी जाता सा रहा है।

यूँ ही थोड़ी रुकेंगे, हर पल को जीते चलेंगे।
वक्त वक्त की बात है, कुछ से सीखेंगे कुछ से सबक लेते चलेंगे।

शतरंज के खेल सी ज़िंदगानी।

शतरंज के खेल सी ये ज़िन्दगानी,

जीने को होती जंग सुहानी।

प्यादों के रूप परेशानियों ने घेरा

अपनी होकर भी चलती केवल अपना फेरा।

अंत तक जा बना जाती कुछ जीत की राहें,

कुछ खत्म हो देती सबक सुहाने,

ना होने की ख़ुशी ना जाने का ग़म हैं देतीं

फिर भी ज़रूरी इनके अस्तित्व की भी कहानी।

शतरंज के खेल सी होती ये ज़िन्दगानी।


हाथी स्वरुप परिवार खड़ा, चलना सिखाये केवल सीधी राह।

घोड़े जैसे साथी कुछ, ढाई कदम बस चलते संग।

ख़ास यार हैं टेढ़े वाले, ऊंट जैसी चलते ये चालें।

शतरंज के खेल सी ये ज़िन्दगानी।

बगल में आधा अंग हो जैसे, ऐसे बैठे रानी प्यारी,

उसकी कोई काट नहीं है, संगत की हर बात निराली,

चारों ओर से रखे निगरानी, चालें उसकी सबपर भारी।

शतरंज जैसी ये ज़िन्दगानी।


राजा स्वरुप हर शक्श यहां है,

धीरे धीरे बढे लाचारी।

किसी एक ने भी हाथ जो छोड़ा,

एकदूसरे के लिए ना होकर स्वार्थ से नाता जोड़ा,

बिगाड़ देगा सारा संसार,

जीत जाएगा कोई और ये वार।

सबका साथ सबका विकास इसे कहते हैं,

जब सब अपने मिलकर रहते हैं।

एक गया तो कमी खलेगी,

ज़िन्दगी फिर भी नहीं रुकेगी।

चलना तो स्वभाव है अपना,

ज़िन्दगी का मतलब ही है गिरना फिसलना और सम्भलना।

खुदगर्ज़ बने तो हार जाओगे,

अपनों के बिन क्या लड़ पाओगे।

समझे जो ये खेल सही से,

जीवन उसका ना रुके कहीं पे।

शतरंज सी ये ज़िन्दगानी,

सुख दुख की होती यही निशानी।।। 

                                        (प्रिया मिश्रा)

झूठी होती रिश्तों की कहानी।

झूठी होती जा रही रिश्तों की कहानी।

साथ होने के बाद भी अकेलापन है इसकी निशानी।

मोबाईल पर ढूंढ रहे हैं दोस्त नए,

सामने रहने वालों की कभी कदर ना जानी।

अपनों के लिए समय नहीं है 

अलग ही जैसे दुनिया बना ली।


समझ किसी को जानने की,

फोन तक ही सीमित हुई।

दूर रहे तो याद करे,

पास होने पर फिकर नहीं।

ऐसी कौन सी है हमने दौलत पा ली?

की झूठी होती जा रही रिश्तों की कहानी।

साथी सभी डिजिटल हो गए,

साथ होते हुए भी सब बिखर से गये,

दुःख भी अपने स्टेटस में दिखते हैं,

ग़म है भी या नहीं इसकी कोई पहचान नहीं,

ऐसी हो गई ज़ज़्बात की रवानी।

बिन गैजेट्स हम बोर होते हैं,

नए रिश्तों को हम रोज़ खोजते हैं।

तसल्ली दी जिसने वो अपने हो गए,

अपनों ने डाँट क्या दिया सब सपने हो गए।

कहीं पब्जी कहीं राजनैतिक लड़ाई,

इन सबमें हम कहाँ घुस गए?

खुद को खोकर खुद की ही खोज है जारी,

क्योंकि झूठी होती जा रही रिश्तों की कहानी।

साथ होने के बाद भी अकेलापन है इसकी निशानी।।

                           (प्रिया मिश्रा)


नए युग के साथ डिजिटल होते रिश्ते।

नए युग के आगाज़ में आज रिश्तों के मायने भी डिजिटल होते जा रहे हैं।

हम सभी एक दूसरे के संपर्क में तो होते हैं। किंतु पास बैठ कर एक दूसरे के बारे में जानने का, दुःख सुख बाँटने का समय नहीं होता। रोज़ाना office से घर आने पर जो भी समय हमें मिलता है, उसे हम अपनी डिजिटल दुनिया को देना परिवार से अधिक महत्वपूर्ण रखते हैं।

यदि किन्ही कारणवश कोई दुर्घटना हो जाती है, तो हम सहायता करने की बजाय लोगों तक ये खबर पहुँचाने की होड़ में लग जाते हैं। क्यों जरूरी है हमारे लिए ये सब? क्यों हम इतने निर्मम हो चुके हैं कि हमें दूसरों के दर्द का भी एहसास नहीं होता? कुछ दिनों पहले की बात है।

मेरे घर के पास एक सज्जन के पिताजी का देहांत हो गया। सुबह के करीब 4 बजे उनका देहांत हुआ और उन्होंने करीब 5 बजे तक ये खबर social मीडिया पर डालते हुए पोस्ट कर दिया। सुबह अपना फोन check करने के दौरान मुझे यह पता चला की उनके पिताजी अब नहीं रहे। बाहर जा कर देखा तो उनका पार्थिव शरीर वहीँ पड़ा हुआ था। उस समय केवल एक ही सवाल आया की क्या सच में सोशल मीडिया पर पोस्ट डालना, उनके पिता को जिन्हें उस दिन के बाद वो केवल स्मृतियों में ही याद रख पाएंगे, को अंतिम विदाई देने से अधिक महत्वपूर्ण था?


मैं ये नहीं कहती की ऐसा करना गलत है। किंतु मेरे हिसाब से दुःख में व्यक्ति स्वयं को भी कुछ पल के लिए भूल जाता है, और खुद के साथ उसका सारा ध्यान अपनों को सँभालने में लग जाता है। ऐसे में फोन पर पोस्ट डालना याद रहना तो केवल यही दर्शाता है कि आपका फोन व्यक्ति के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया पर आप लिखते हो भावपूर्ण श्रद्धांजलि, किन्तु वास्तविकता में यहाँ कोई भाव तो दिखता ही नहीं है।

मेरे हिसाब से ऐसी स्थिति में हमें जरूरत है कुछ पल अपने परिवार के साथ बिताने की। उनका हाथ पकड़ उनके साथ होने का एहसास कराने की। क्योंकि रिश्ते और इंसान डिजिटल नहीं होने चाहिए।यदि हम कुछ समय के लिए online की दुनिया से बाहर आ कर अपने अपनों को देते हैं, तो हमारा अकेलापन कब खत्म हो जायेगा हमें एहसास भी नहीं होगा।


वक्त के निराले खेल।

वक्त के भी खेल निराले, साथ हो तो ज़िन्दगी बना दे।।

ये दुनिया केवल, वक्त का खेल है।

हो वक्त तेरा तो सब अपने वरना सबसे बैर है।

तमाशे की दुनिया है साहब, वक्त में ही होते सब अपने यहाँ,

वक्त नहीं तो मतलबी होती दुनिया यहाँ।


जब मुझे ज़रूरत है, कोई पास नहीं।

जब ज़रूरत होगी मेरी, तब आयेगा ये पल भी याद किसी को याद नहीं।

जानते हुए भी चुप हैं फिर भी,

बस देख रहे तमाशा, बन के अजनबी हम भी।

ज़रूरत में सब छोड़ जाते लोग उसी हाल पे,

जो रहते  वो भी होते बस नाम के।


फिर भी है ज़िद है कुछ पाने की,

देखते हैं कब तक चलती है हम पर मनमानी बेकार ज़माने की।

कौन किसका अपना है ये वक्त बताता है।

फरेबी लोगों के बीच कौन अपना साथ निभाता है।

वक्त वक्त का खेल है सब,

वरना कौन कितना किसको सह पाता है।

इसीलिए तो वक्त के भी खेल निराले, साथ हो तो ज़िन्दगी बना दे।।।     


                 (प्रिया मिश्रा)

ज़िन्दगी का संसार।

ना जाने कैसा कर्मों का संसार निकला,

जिसे चाहा उसी सफलता का गुनहगार निकला।

कुछ बातें बुरी लगती है मुझे अपनी ही,

क्या सोचा क्या पाया सब बेकार निकला।


सोचा था कभी गिरना नही है,

पर कुछ और हरबार निकला।

सोचा था कहना हूं मैं भी कुछ,

ये शब्द ही सारा नाकाम निकला।

नाम कैसे बनाऊं मैं  खुदका? 

कांटे की तरह इस बात का अंजाम निकला।

समझने में देर कर दी पर कोई बात नहीं,

कमी रही, तो मेहनत का तराना भी बेकार निकला।

अरमान सजाया सफलता का मैंने ज़िन्दगी में,

समझ नहीं आता कर्म बुरा या किस्मत का खाली आसमान निकला।

मैं तो कुछ हूँ ही नहीं, बस एक नमूना जिसकी प्रयास उसी पर भारी हैं।


मन आया कर्मप्रधान हो जाते हैं,

मन आया सपनों में ही खो जाते हैं।

अजीब अजीब से मंज़र हैं हालातों के भी,

हर बात के अपने ही नज़ारे हैं।

जिससे डरता  है मन सोचकर ही,

उस असफलता के लिए क्यों कर्म बनाएं हैं।

जब मेहनत से खुश हूँ, तब क्यों आलस्य के नज़ारे हैं।

 अकेले में एक बात ही आती है फिर भी,

जाने कैसा संसार निकला,

 जिस सफलता को चाहा कभी,

 उसकी मैं या वो मेरी हार निकला। 

                                   (प्रिया मिश्रा)

बस्तियों में रह आना।

By Priya Mishra in Hindi, Poetry


कभी वक्त मिले तो बस्तियों में रह आना।

 

तम्बू लगाकर बारिश में,

तुम कुछ दिन ठहर कर आना।

थोड़ी सी जगह में पूरा परिवार रखना,

बिन पैसों के जीवन की चाह रखना।

लकड़ियां इकट्ठी कर स्वयं से

तुम भोजन का जुगाड़ करना।

 

ठण्ड में बिन कपड़ों के कभी रात बसर कर आना,

कभी वक्त मिले तो बस्तियों में रह आना।

 credit: third party image reference


नालियों की गंध, कीड़े- मकोड़ों संग,

कुछ साथ निभा आना।

बीमारी के साये में हरपल जीते दो पल की

खुशियां बना आना।

 

जो मिला वह बेहतर है,

ये पाठ ज़रा पढ़ आना।

ज़रूरतमंद की मदद में तुम खुद को जिता आना,

कभी हार मान जाओ तो बस्तियों में रह आना।

 


एक दिन का जीवन बिताकर देखो,

यदि कर पाओ तुम ऐसा तो

जीवन का तुम शुक्र मना आना,

हाथ बढाकर थोड़ा सा तुम प्यार बांट कर आना।

 

अभाव के साथ भी जीते हैं वे,

हरपल में डर को लिए हुए।

टुकड़े-टुकड़े को तरस रहे,

अर्धनग्न से पड़े हुए।

 

ना शिक्षा ना ज्ञान यहां,

हरपल है अपमान यहां

कौन अपना कौन पराया,

कौन दे किसका ध्यान यहां।

 

दर्द महसूस कर तुम स्वयं से उनका,

उनके प्रति थोड़ा सम्मान जगा आना।

जी कर उनका जीवन तुम,

अपने से नीचे का मान समझ आना।

 

दबे लोगों में एक आस जगा आना,

वक्त मिले तो बस्तियों में रह आना।

कुछ कर ना सको तो प्यार से

बोल के शब्द सीख आना।

कर इनके काम का सम्मान

इंसानियत का द्वीप जगा आना।

 

कभी वक्त मिले तो बस्तियों में रह आना।

                         (प्रिया मिश्रा)

रिश्ता इंसानियत का।

स्वतंत्रता दिवस के रोज़ पास वाले स्कूल में फूहड़ गाने बज रहे थे

By Priya Mishra  in  Hindi ,  Society “गणतंत्र दिवस के रोज़ पास वाले स्कूल में फूहड़ गाने बज रहे थे” स्वतंत्रता दिवस के रोज़ अपने घर पर बैठे...