स्वतंत्रता दिवस के रोज़ पास वाले स्कूल में फूहड़ गाने बज रहे थे

“गणतंत्र दिवस के रोज़ पास वाले स्कूल में फूहड़ गाने बज रहे थे”

स्वतंत्रता दिवस के रोज़ अपने घर पर बैठे हुए विद्यालयों के कार्यक्रमों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। गणतंत्र दिवस के अवसर पर शुरुआत झंडा रोहण के साथ ही राष्ट्रगान से हुई, मन देशभक्ति से परिपूर्ण हो गया।

किन्तु कुछ ही पलों में यह क्या? फिल्मी गीतों से महफिल सजने का आभास सा हुआ और यह क्रम ऐसा चला कि लगने लगा जैसे गणतंत्र दिवस नहीं, बल्कि फिल्मी नगमों का दिवस मनाया जा रहा हो यहां पर।

 “तेरी आंखों का काजल” जैसे फूहड़ गानों से क्या बच्चों में देशप्रेम जगाया जा सकता है?

मन में एक सवाल घर कर गया है कि क्या सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर रंगारंग कार्यक्रमों के माध्यम से इन विद्यालयों में बच्चों को शिक्षा मिल रही है? क्या इस ढंग से देश के प्रति सम्मान, देश की संस्कृति और सभ्यता का विकास हो पाएगा?

विद्यालयों का ऐसा माहौल चिंताजनक है

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ है। अक्सर अपने गाँव के विद्यालयों में ऐसा माहौल इस अवसर पर देखने को मिल ही जाता है।

इस अवसर पर तो मौका मिलता है कि हम स्टूडेंट्स में देशभक्ति की भावना विकसित कर सकें और सास्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से स्टूडेंट्स को अपने देश के संस्कार और संस्कृति से अवगत कराया जाए। उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में हुए आंदोलनों इत्यादि के बारे में जानकारी दी जाए मगर ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों का ऐसा माहौल चिंताजनक है।

इसके पीछे यदि देखा जाए तो कारण अज्ञानता है। विद्यालयों को शिक्षा का माध्यम तो समझा जाता है मगर प्राइवेट स्कूलों को खोलने वाले लोगों को यह पता ही नहीं होता है कि उन्हें शिक्षा के साथ अपने स्टूडेंट्स को संस्कार किस प्रकार दिया जाना चाहिए।

ज़्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालय खोलने में समर्थ वही लोग होते हैं, जिनके पास रोज़गार का ज़रिया नहीं होता है। उनका उद्देश्य केवल रोज़गार होता है, जिसके चलते वे इस विषय में शिक्षा के अतिरिक्त सोच ही नहीं पाते हैं।

मेरे हिसाब से जब भी किसी स्कूल के लिए अप्रूवल मिले, उसी समय उन्हें यह समझाया जाना चाहिए कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों से बच्चों में संस्कृति का विकास होता है। ऐसे में उन्हें सांस्कृतिक बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए, ना कि फिल्मी।

cagdi

 भारत राष्ट्र को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विकसित राष्ट्र स्थापित कराने हेतु हमारी भूमिका कृषि के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों को दूर करने हेतु आवश्यक रणनीति बनाने, कृषि संबंधित चुनौतियों को समाप्त कर सतत प्रयासों के द्वारा देश के विकास में सहयोग करने की है।

एक प्रतिनिधि के तौर पर किस प्रकार से कार्य किया जाए जिसके माध्यम से देश कृषि के क्षेत्र में अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सके, रिपोर्ट के आधार पर निम्न है:-

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला एवम् ग्रामीण जनसंख्या में 70% के जीविकोपार्जन के साधन के साथ विदेशी व्यापार का मूल स्त्रोत है। कृषि के माध्यम से राष्ट्रीय आय का लगभग 20-30% प्राप्त होता है। कृषि व्यवसाय ना होकर देश में जीवनयापन का साधन भी माना जाता है।

कृषि द्वारा राष्ट्रीय आय में निभाई जाने वाली भूमिका :-

 खाद्यानो की आपूर्ति
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवम् विदेशी मुद्रा अर्जन का साधन,
राज्य सरकारों की आय का प्रमुख स्रोत
आर्थिक विकास में साधनों का आधार
यातायात मूल्य स्थिरता कारक
व्यापार एवम् वित्त व्यवस्था का स्त्रोत
राजनीतिक व सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण,
पशुपालन के डेयरी उद्योग की समृद्धि कृषि पर आधारित है।

भारतीय कृषि की बाधाएं :- 

 देश में कृषि आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हुए भी पिछड़ी हुई है। इसके पीछे कुछ निम्न बाधाएं हैं।

1 प्राकृतिक बाधाएं - मानसूनी अर्थव्यवस्था, कीड़े मकौड़े तथा पौधों की बीमारियां, भूमि कटाव से उर्वरा शक्ति का ह्वास इत्यादि।
2 आर्थिक बाधाएं - वित्तीय साधनों का अभाव, वैज्ञानिक यंत्रों एवम उपकरणों का अभाव रासायनिक खादों के उपयोगों की जानकारी का अभाव, सिंचाई साधनों का अभाव, उत्तम बीजों व कीटाणुनाशक औषधियों का अभाव।
3 संगठनात्मक बाधाएं - खेतों का उपखंडन एवम उपविभाजन, दोषपूर्ण भूमि व्यवस्था एवम् भूमि सुधार की धीमी गति, कृषि विशेषज्ञों तथा प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव अनार्थिक जोतें।
4) सामाजिक एवम् राजनैतिक बाधाएं - जनसंख्या में तीव्र वृद्धि से कृषि पर बढ़ता जनभार, अशिक्षित रूढ़िवादी व परंपरागत दृष्टिकोण तथा कुछ राजनैतिक कारण भी शामिल हैं।


5) खाद्यान्न पदार्थों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु कृषि विकास में सरकार द्वारा किए निरंतर प्रयासों के कारण ही आज देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर है। किंतु कृषि विकास को बढ़ावा देने हेतु अभी आधुनिक बदलावों के समावेश तथा कृषकों के मध्य जागरूकता पैदा करने के साथ ही कृषि के माध्यम से व्यवसाय हेतु प्रेरणा और जानकारी देने के कार्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

6) प्रोद्योगिकी क्षेत्रों में सिंचाई साधनों का विकास, उन्नत बीज, रासायनिक खाद व कृषि के वैज्ञानिक उपकरणों के उपयोग में विस्तार की नीतियों पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

7) वैज्ञानिक कृषि द्वारा कम से कम समय में अधिकाधिक कृषि उत्पादन तथा मांग एवम् पूर्ति के अंतराल को बांटना, जिसके अंतर्गत उर्वरकों का बढ़ता प्रयोग कीटाणुनाशक दवाओं, मशीनों, उन्नत बीजों सिंचाई के साधनों आदि को विशेष बढ़ावा देने का समावेश किया गया है। लघु योजनाओं पर जोर, बहुफसलीय कार्यक्रम, पौधों का संरक्षण, भूमि सुधार एवम् भू संरक्षण, खाद्य फसलों के विस्तार पर बल, कृषि विकास हेतु संस्थाओं के माध्यम से कृषि विकास को बढ़ावा, कृषि का यंत्रीकरण व उन्नत उपकरणों के उपयोग को बढ़ावा, कृषकों को उचित मूल्य की गारंटी, वाणिज्यिक फसलों का विकास तथा पशुपालन विकास।

8) इसके अलावा जोतों की चकबंदी के माध्यम से भूमि के अपखंडन को कम करते हुए एक बड़े भूभाग के निर्माण हेतु कृषकों को प्रेरित किया जाए, बड़े भूभाग में जितने कृषक कार्यरत हों उन्हें सरकार अथवा कृषि संस्थानों के माध्यम से किराए पर उपकरण एवम् उन्नत बीजों जैसी आवश्यक वस्तुएं मुहैया कराई जाएं, तथा कृषि के माध्यम से उत्पन्न पैदावार को उचित मूल्य पर किसानों से खरीदा जाए, ऐसे में न सिर्फ पैदावार अच्छी होगी, बल्कि कम खर्च पर बड़े भूभाग पर अधिक मुनाफा होने से किसानों को भी लाभ प्राप्त होगा। इस प्रक्रिया को हम सामूहिक कृषि के रूप में जानते हैं जिसका उपयोग सर्वप्रथम 1990 में सोवियत रूस के द्वारा किया गया था।

इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत है की इसमें राज्य की संपत्ति होती है, भूमि का भूभाग बड़ा होने से लाभ अधिक मिलता है तथा उन्नत तकनीकों का प्रयोग आसान हो जाएगा।

यह व्यवस्था सहकारी कृषि व्यवस्था से अलग है, क्योंकि इसमें सरकार का हस्तक्षेप उतना अधिक नहीं होता है, जिससे किसान को अपनी भूमि के अधिग्रहण का भी डर नहीं सताता और उसे अपनी ही भूमि में आसानी से रोज़गार प्राप्त होता है।

Soil health card के माध्यम से भूमि की उर्वरता की जांच एवम् उसके आधार पर उर्वरकों का प्रयोग, वर्मी कंपोस्ट खाद व नीम कोटेड यूरिया जैसे प्राकृतिक तौर पर निर्मित उर्वरकों के प्रयोग की जानकारी हो ताकि कृषि अपशिष्ट का उपयोग हो सके। इसके साथ ही किसान क्रेडिट कार्ड, प्रधानमंत्री किसान समान निधि, इत्यादि सरकारी योजनाओं एवम् तकनीकों की जानकारी से किसानों को अवगत कराना। 

इसके अलावा कृषि द्वारा उत्पन्न कचरे के निपटान पर भी ध्यान देना आवश्यक है, जिसमें पराली एक मुख्य समस्या है। इसके लिए हैप्पी सीडर जैसी व्यवस्थाओं को लागू करना चाहिए।

कमर्शियल फसलों को बढ़ावा देने हेतु उन्नत किस्म के उपकरणों का प्रयोग करते हुए किसानों को संस्थानों के माध्यम से टारगेट दिया जाए जिससे वे व्यापार के माध्यम से भी लाभ प्राप्त कर सकें। 

इस प्रकार कृषकों को वाणिज्यिक एवम तकनीकी ज्ञान के माध्यम से, तथा एक दूसरे का साथ देते हुए छोटे भूभागों को मिलाकर बड़े भूभाग का निर्माण, डेयरी उत्पादों को बढ़ावा देने से देश ना सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर, अपितु पैदावार बढ़ने एवम फसलों के सुरक्षित होने की दशा में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विकसित राष्ट्र बनने की राह पर एक कदम आगे होगा।

सरकार द्वारा समय समय पर योजनाओं के माध्यम से कृषकों को राहत देने का कार्य किया जाता है, किंतु सही जानकारी के अभाव एवम करप्शन की वजह से कृषकों तक लाभ नहीं पहुंच पाता है, ऐसी स्थिति में कृषकों को एक ही स्थान पर पोर्टल के माध्यम से समस्त जानकारी उनकी क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध कराने, एवम् ZCBP के तहत उनकी सुविधा हेतु शिकायत पोर्टल के माध्यम से शिकायत की व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही इसके विषय में कृषकों को जागरूक किया जाय ताकि वे योजनाओं का लाभ बिना किसी बिचौलिए के संपर्क में आए प्राप्त कर सकें।

IT Bill 2022

क्या है IT Bill 2022, 

हाल ही में दूरसंचार मंत्री अश्वनी वैष्णव द्वारा Indian telecommunication bill 2022 का मसौदा पेश किया गया। जिसे जन सामान्य के सुझावों हेतु public domain में रखा गया है। जिससे संबंधित सुझाव एवम् विचार आप गवर्नमेंट मेल Naveen.kumar71@gov.in के माध्यम से 20 अक्टूबर 2022 तक मेल कर सकते हैं। 

क्यों पड़ी जरूरत:- 

1) भारत में इंटरनेट के लगभग 117 करोड़ सब्सक्राइबर्स हैं। 
2) भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा telecommunication Ecosystem है।
3) IT sector हमारी जीडीपी में 8% योगदान देता है और इसके साथ ही लगभग 40 लाख की आबादी सीधे तौर पर रोजगार प्राप्त करती है।

अतः भारत के आर्थिक विकास में सहायक तकनीक को सरकार द्वारा रेगूलेट करने के प्रयास को लेकर सरकार का कहना है की एक ओर जहां देश आई टी सेक्टर में आगे बढ़ते हुए 5G स्पेक्ट्रम लाने की पूरी तैयारी कर चुका है। वहीं दूसरी ओर देश की telecommunication authority अब भी देश की आज़ादी के समय और उससे भी पूर्व के बने कानूनों पर काम कर रही है। जिससे देश में इंटरनेट के बढ़ते प्रयोगों से उनसे होने वाले क्राइम एवम् नियम कायदों संबंधित कानून नहीं हैं, या नाम मात्र वैल्यू के रह गए हैं। अब तो टेलीग्राफ की जगह मोबाइल्स ने भी ले ली, किंतु नियम टेलीग्राफ के लिए ही बने हुए हैं। ऐसे में यह जरूरी है की देश में इतने पुराने बिल पर संशोधन कर आई टी सेक्टर हेतु नए कानून बनाएं जाएं। 

कानून जिनके तहत अब तक कार्य होता रहा है:-
1) Indian Telegraph Act 1885
2) Indian। Wireless Telegraphy Act 1933
3) The Telegraph wires (unlawful protection) Act 1950

क्या होंगे बदलाव:-

इस बिल का मसौदा आई टी कानूनों में मूलभूत परिवर्तन लाने हेतु यूनाइटेड नेशंस जैसे ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, यूके, जापान, USA जैसे देशों का अध्ययन करके तैयार किया गया है।

आईटी सेक्टर में ऐसे बिल की आवश्यकता है जो minimum हो पर उसका रेगुलेशन इफेक्टिव हो और उसकी regulatory sertain हो।

इस बिल के अनुसार OTT संचार सेवाओं को शामिल करने की बात जिसमें whatsapp, zoom, Signal, telegram शामिल हैं।

OTT संचार सेवाओं को भी अब जियो, एयरटेल जैसी कंपनियों की तरह लाइसेंस व्यवस्था के तहत अब लाइसेंस की आवश्यकता होगी।

बिल में Trai (telecom regulatory authority of India) का काम अब केवल सलाह देने तक करके उसकी शक्ति को कमजोर कर दिया गया है।

इस बिल में टेलीकॉम प्रोवाइडर्स को राहत दी गई है, जिसके अनुसार यदि वे अपना काम ठीक ढंग से नहीं चला पा रहे हों तो ऐसी स्थिति में वे अपना खरीदा स्पेक्ट्रम वापस कर सकेंगे जिसे किसी अन्य जो इसे चलाना चाहे द्वारा खरीदा जा सकेगा।

टेलीकॉम प्रोवाइडर्स के through सरकार सर्विसेज का 5% हिस्सा Universal services obligation fund के नाम से लेती है, जिसका उपयोग केवल रुलर कनेक्टिविटी के क्षेत्र में ही होता था। ऐसे में USOF का नाम बदलकर अब Telecommunication Development Fund (TDF) कर दिया गया है जिसका उपयोग अब आईटी सेक्टर में रिसर्च एंड डेवलपमेंट, स्किल डेवलपमेंट में करते हुए इसे और विकसित किया जायेगा।

लीगल फ्रेमवर्क के माध्यम से यूजर्स का हैरेसमेंट (spam safety) को भी रेगुलेट किया जायेगा।

अपील करने हेतु Right Of Appeal का अधिकार दिया जाएगा।

क्या है विरोध की वजह:-
बिल के प्रावधान में सरकार द्वारा व्हाट्सएप जैसे ऐप्स के मैसेज को देश की संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए आवश्यकता पड़ने पर पढ़े जा सकने की बात को लोगों द्वारा आड़े हाथों लिया है।
यूजर्स का कहना है की इससे उनकी निजता का उल्लंघन होगा।ज्ञात हो की कट्टू स्वामी केस द्वारा निजता के उल्लंघन को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया है। ऐसे में बिल के इस प्रावधान का जमकर विरोध किया जा रहा है। 

इस बिल से संबंधित अपने सुझाव आप सरकार तक ऊपर लिखे मेल के माध्यम से 20 अक्तूबर तक प्रेषित कर सकते हैं।

2022 75th indipendence day

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज़ादी की 75वीं सालगिरह पर लाल किले की प्राचीर से देश देश को संबोधित करते हुए आज देश को जय जवान जय किसान और जय विज्ञान के बाद चौथा नारा जय अनुसंधान का दिया। 
(जय जवान जय किसान लालबहादुर शास्त्री एवम् जय विज्ञान अटल बिहारी द्वारा दिया गया था।)

‌प्रधानमंत्री द्वारा आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ पर लिए पांच संकल्प।
1. अब देश विकसित भारत जैसे बड़े संकल्प लेकर चले।
2. हमने सैकड़ों वर्षों से जो अपने मन में गुलामी की जंजीर बांध रखी है उसे अब समाप्त करने का संकल्प।
3. एक भारत श्रेष्ठ भारत जैसे स्वप्न के लिए सभी में एकता और एकजुटता का संकल्प।
4. हमें अपनी विरासतों जिनकी वजह से भारत को स्वर्णिम काल मिला, पर गर्व करना चाहिए और इसके सम्मान का प्रण लेना चाहिए।
5. देश के प्रत्येक नागरिकों द्वारा कर्तव्यों के निर्वहन का संकल्प।

इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने नारी के सम्मान में बात करते हुए कहा कि हम सभी के अंदर ऐसी विकृति है जिससे हमारी बोल- चाल में, हमारे व्यवहार में, हमारे शब्दों में हम नारी का अपमान करते हैं, हमें स्वभाव, संस्कार व रोजमर्रा की जिंदगी में नारी को अपमानित करती हर बात से मुक्ति का संकल्प लेना चाहिए।

भाषण से जुड़ी 10 महत्वपूर्ण बातें:-

1. भ्रष्टाचार और परिवारवाद, भाईभतिजवाद के खिलाफ जागरूकता की बात की।
2. भाषा के बंधन से प्रतिभा को मुक्ति दिलाने की बात कही गई।
3. जय अनुसंधान का नारा देते हुए देश के वैज्ञानिकों को सम्मान देने की बात कही गई।
4. संयुक्त परिवार को देश की बड़ी विरासत का दर्जा दिया गया।
5. उन महापुरूषों को याद किया गया जिन्होंने देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण योगदान दिए किंतु उन्हें इतिहास में जगह नहीं मिली या उन्हें भुला दिया गया।

6. भारत के प्रति प्रेम के कारण 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस को देशवासियों द्वारा खुशी खुशी दर्द सहने की बात कही।

7. इन 75 वर्षों में ऐसा कई बार हुआ जब दुनिया के बड़े देशों द्वारा हमें तोड़ने, डराने का प्रयास किया गया। किंतु तब भी भारत हमेशा ही आगे बढ़ता गया, और आज अपने सतत प्रयासों की वजह से इस मुकाम तक आया।

8. मोदी जी द्वारा बच्चो के विदेशी खिलौनों से ना खेलने की बात कहते हुए स्वदेशी खिलौनों को बढ़ावा देने की बात कही गई।

9. सेना के जवानों, सेनानायकों को सलाम किया गया।
10. भारत के लोकतंत्र को "Mother of democracy" (लोकतंत्र की जननी) कहा गया।

इसके साथ ही आज़ादी के अमृत महोत्सव की रूस, अमेरिका, चीन, समेत कई देशों द्वारा बधाई दी गई।।

वर्चस्व की लड़ाई। 2022

अमेरिका और चीन के बीच चल रही वर्चस्व की लड़ाई क्या विश्व को तीसरे विश्व युद्ध तक ले जा रही है।

हाल ही में अमेरिका द्वारा अमेरिकी प्रतिनिधि नैंसी पेलोसी को ताईवान की यात्रा पर भेजा गया। अमेरिका द्वारा नैंसी के ताईवान यात्रा पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिका को इसके विषय में धमकी भी दी गई थी। किंतु अमेरिका ने इसका ध्यान ना रखते हुए छल पूर्वक नैंसी की ताईवान यात्रा संपन्न करवाई, एवम् वापसी के दौरान भी उनके वापस आने के रास्ते को परिवर्तित करते हुए दक्षिण कोरिया की राजधानी सिओल में लैंडिंग करवाई गई। 
इसी बीच चीन द्वारा भले ही अमेरिका को प्रतिक्रिया ना दी गई हो, किंतु संभव है की वह ताईवान, जिसने अमेरिका को अपने यहां आने का निमंत्रण दिया, सज़ा के तौर पर उसके खिलाफ कोई कार्यवाही करे।
चीन द्वारा ताईवान के साथ के सभी एयर ट्रैफिक्स को कंट्रोल करना, लगभग 2 हजार से अधिक खाद्य पदार्थों जो की चीन द्वारा भेजे जाते रहें हैं, को बैन करना, ताईवान के आस पास उड़ती एयरलाइंस को आगाह करना जैसी हरकतें चीन द्वारा ताईवान पर हमला किए जाने की ओर इशारा करती हैं।
 यदि ऐसा होता है, तो अमेरिका जो की केवल अपने वर्चस्व को कायम रखने और विश्व में अपने हथियारों को बेचने की होड़ में लगा रहता है। इससे उसका कोई नुकसान फिलहाल भले ही ना हो। किंतु ताईवान के लिए यह नुकसानदेह होगा।
 वर्चस्व एवम् अस्तित्व के लिए लगी इस होड़ में परिणाम क्या निकलेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। किंतु इन सबके बीच रुख कहीं तृतीय विश्व युद्ध की स्थिति ना उत्पन्न कर दे।
रूस और यूक्रेन का युद्ध अब तक किसी परिणामी स्थिति तक नहीं पहुंच पाया, जिसकी वजह से आज विश्व को मंहगाई का सामना करना पड़ रहा है।
ऐसे में यदि चीन द्वारा ताईवान पर हमला किया जाता है, तो इसकी वजह से संभव है की अन्य देश भी इसमें शामिल हों। 
और अगर अन्य देश शामिल नहीं भी होते, तब भी अन्य देशों जिनमें एक दूसरे के साथ भूमि विवाद चल रहे हैं, उनमें भी युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो।

इन सबमें भारत का पक्ष देखने लायक होगा। क्योंकि एक तरफ जहां चीन विवादित POK से होते हुए चाइना इकोनॉमिक कॉरिडोर का निर्माण कर रहा है। वहीं जब बात चीन की वन नेशन पॉलिसी की होगी, तब भारत का पक्ष क्या होगा।
फिलहाल तो चीन और अमेरिका की इस लड़ाई में ताईवान पर क्या असर पड़ेगा, और उसकी वजह से विश्व में किस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होगी, यह आने वाला समय ही बताएगा|

Tokyo Olympic 2020 India's Proud Moment


मेहनत के भाले को फेंक विश्व विजय का प्रण ले,
हे कर्मवीर रण के अर्जुन तू, जय भारत की कर दे।।

हिंद की शान है तू, देश का जवान है तू,
बाजुओं में अपनी जान भर दे।।
वतन के झंडे को फहरा दुनिया में,
ऊंचा गर्व से भारत मां का नाम कर दे।।।

स्वर्णिम क्षण। नीरज चोपड़ा🇮🇳 💐💐

Dream to Me


ख्वाबों की नगरी का तपता पुजारी,
अरमानों में अपनी दुनिया सज़ा ली।
ज़िंदगी की किताब को खोलकर,
हर पन्ने का स्वरूप संवारेंगे।

भोर की शांति

भोर की शांति कमाल कर देती  है,
मन के भंवर को भी मुस्कान से भर देती है।।

मीठी नींद के खुलते ही जागते सपने में ले जाती है,
कुछ ऐसा ये बवाल कर देती है।।

आँखे मींचते उठूं मैं मुस्कुराकर जब भी,
दिल में उल्लास जगा ये खुशियां भर देती हैं।

अजीब सा शोर रहता है दिनभर,
इन सारी हलचलों को मौन कर देती हैं।।
भोर की शांति कमाल कर देती है,
चेहरे पर ना कोई थकान ये देती है।।

रंग बिखेरे हल्की किरण,
जब चेहरे को छूती है,
अलग तेज सी रौनक ये अंदर तक भर देती है।

भोर की शान्ति भी कमाल कर देती है,
मन की सारी हलचल हर लेती है।।।

सरसरी निगाहों से देखता निकल गया, आज फिर हाथों से रेत सा फिसल गया:- वक्त।

सरसरी निगाहों से देखता निकल गया,
आज फिर वक्त हाथों से रेत सा फिसल गया।

आज के वक्त को खुद मैं भी जाने देना चाहूँ,
पानी की तेजी से इसे स्वयं बहा देना चाहूँ।

कल वक्त रोकेंगे अपने समय पर,
जब मुस्कुरा कर मिलेंगे खुद से पलट कर।

जो मैं आज हूँ वो कल तो नहीं रहना है,
कल की तलाश में यूँ ही नहीं बहना है।

कुछ समय और चंद लम्हों की छड़ी है,
इंतज़ार खत्म बस इम्तहानों की घड़ी है।

जितना खुद से मिलना हुआ उतना इतराना आया,
अपने जीवन के नए अंदाज का फ़साना आया।

आज को याद कर कल खुद में गर्व करेंगे,
इंसान अलग हैं भई थोड़ा तो हट के चलेंगे।

वक्त की तलाश में वक्त से अजनबी भी ना रहेंगे,
जैसा चाहेंगे वैसा खुद में ढलेंगे,

क्योंकि वक्त किसी के पास ज़्यादा ना रहा,
जो है वो भी जाता सा रहा है।

यूँ ही थोड़ी रुकेंगे, हर पल को जीते चलेंगे।
वक्त वक्त की बात है, कुछ से सीखेंगे कुछ से सबक लेते चलेंगे।

शतरंज के खेल सी ज़िंदगानी।

शतरंज के खेल सी ये ज़िन्दगानी,

जीने को होती जंग सुहानी।

प्यादों के रूप परेशानियों ने घेरा

अपनी होकर भी चलती केवल अपना फेरा।

अंत तक जा बना जाती कुछ जीत की राहें,

कुछ खत्म हो देती सबक सुहाने,

ना होने की ख़ुशी ना जाने का ग़म हैं देतीं

फिर भी ज़रूरी इनके अस्तित्व की भी कहानी।

शतरंज के खेल सी होती ये ज़िन्दगानी।


हाथी स्वरुप परिवार खड़ा, चलना सिखाये केवल सीधी राह।

घोड़े जैसे साथी कुछ, ढाई कदम बस चलते संग।

ख़ास यार हैं टेढ़े वाले, ऊंट जैसी चलते ये चालें।

शतरंज के खेल सी ये ज़िन्दगानी।

बगल में आधा अंग हो जैसे, ऐसे बैठे रानी प्यारी,

उसकी कोई काट नहीं है, संगत की हर बात निराली,

चारों ओर से रखे निगरानी, चालें उसकी सबपर भारी।

शतरंज जैसी ये ज़िन्दगानी।


राजा स्वरुप हर शक्श यहां है,

धीरे धीरे बढे लाचारी।

किसी एक ने भी हाथ जो छोड़ा,

एकदूसरे के लिए ना होकर स्वार्थ से नाता जोड़ा,

बिगाड़ देगा सारा संसार,

जीत जाएगा कोई और ये वार।

सबका साथ सबका विकास इसे कहते हैं,

जब सब अपने मिलकर रहते हैं।

एक गया तो कमी खलेगी,

ज़िन्दगी फिर भी नहीं रुकेगी।

चलना तो स्वभाव है अपना,

ज़िन्दगी का मतलब ही है गिरना फिसलना और सम्भलना।

खुदगर्ज़ बने तो हार जाओगे,

अपनों के बिन क्या लड़ पाओगे।

समझे जो ये खेल सही से,

जीवन उसका ना रुके कहीं पे।

शतरंज सी ये ज़िन्दगानी,

सुख दुख की होती यही निशानी।।। 

                                        (प्रिया मिश्रा)

झूठी होती रिश्तों की कहानी।

झूठी होती जा रही रिश्तों की कहानी।

साथ होने के बाद भी अकेलापन है इसकी निशानी।

मोबाईल पर ढूंढ रहे हैं दोस्त नए,

सामने रहने वालों की कभी कदर ना जानी।

अपनों के लिए समय नहीं है 

अलग ही जैसे दुनिया बना ली।


समझ किसी को जानने की,

फोन तक ही सीमित हुई।

दूर रहे तो याद करे,

पास होने पर फिकर नहीं।

ऐसी कौन सी है हमने दौलत पा ली?

की झूठी होती जा रही रिश्तों की कहानी।

साथी सभी डिजिटल हो गए,

साथ होते हुए भी सब बिखर से गये,

दुःख भी अपने स्टेटस में दिखते हैं,

ग़म है भी या नहीं इसकी कोई पहचान नहीं,

ऐसी हो गई ज़ज़्बात की रवानी।

बिन गैजेट्स हम बोर होते हैं,

नए रिश्तों को हम रोज़ खोजते हैं।

तसल्ली दी जिसने वो अपने हो गए,

अपनों ने डाँट क्या दिया सब सपने हो गए।

कहीं पब्जी कहीं राजनैतिक लड़ाई,

इन सबमें हम कहाँ घुस गए?

खुद को खोकर खुद की ही खोज है जारी,

क्योंकि झूठी होती जा रही रिश्तों की कहानी।

साथ होने के बाद भी अकेलापन है इसकी निशानी।।

                           (प्रिया मिश्रा)


नए युग के साथ डिजिटल होते रिश्ते।

नए युग के आगाज़ में आज रिश्तों के मायने भी डिजिटल होते जा रहे हैं।

हम सभी एक दूसरे के संपर्क में तो होते हैं। किंतु पास बैठ कर एक दूसरे के बारे में जानने का, दुःख सुख बाँटने का समय नहीं होता। रोज़ाना office से घर आने पर जो भी समय हमें मिलता है, उसे हम अपनी डिजिटल दुनिया को देना परिवार से अधिक महत्वपूर्ण रखते हैं।

यदि किन्ही कारणवश कोई दुर्घटना हो जाती है, तो हम सहायता करने की बजाय लोगों तक ये खबर पहुँचाने की होड़ में लग जाते हैं। क्यों जरूरी है हमारे लिए ये सब? क्यों हम इतने निर्मम हो चुके हैं कि हमें दूसरों के दर्द का भी एहसास नहीं होता? कुछ दिनों पहले की बात है।

मेरे घर के पास एक सज्जन के पिताजी का देहांत हो गया। सुबह के करीब 4 बजे उनका देहांत हुआ और उन्होंने करीब 5 बजे तक ये खबर social मीडिया पर डालते हुए पोस्ट कर दिया। सुबह अपना फोन check करने के दौरान मुझे यह पता चला की उनके पिताजी अब नहीं रहे। बाहर जा कर देखा तो उनका पार्थिव शरीर वहीँ पड़ा हुआ था। उस समय केवल एक ही सवाल आया की क्या सच में सोशल मीडिया पर पोस्ट डालना, उनके पिता को जिन्हें उस दिन के बाद वो केवल स्मृतियों में ही याद रख पाएंगे, को अंतिम विदाई देने से अधिक महत्वपूर्ण था?


मैं ये नहीं कहती की ऐसा करना गलत है। किंतु मेरे हिसाब से दुःख में व्यक्ति स्वयं को भी कुछ पल के लिए भूल जाता है, और खुद के साथ उसका सारा ध्यान अपनों को सँभालने में लग जाता है। ऐसे में फोन पर पोस्ट डालना याद रहना तो केवल यही दर्शाता है कि आपका फोन व्यक्ति के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया पर आप लिखते हो भावपूर्ण श्रद्धांजलि, किन्तु वास्तविकता में यहाँ कोई भाव तो दिखता ही नहीं है।

मेरे हिसाब से ऐसी स्थिति में हमें जरूरत है कुछ पल अपने परिवार के साथ बिताने की। उनका हाथ पकड़ उनके साथ होने का एहसास कराने की। क्योंकि रिश्ते और इंसान डिजिटल नहीं होने चाहिए।यदि हम कुछ समय के लिए online की दुनिया से बाहर आ कर अपने अपनों को देते हैं, तो हमारा अकेलापन कब खत्म हो जायेगा हमें एहसास भी नहीं होगा।


वक्त के निराले खेल।

वक्त के भी खेल निराले, साथ हो तो ज़िन्दगी बना दे।।

ये दुनिया केवल, वक्त का खेल है।

हो वक्त तेरा तो सब अपने वरना सबसे बैर है।

तमाशे की दुनिया है साहब, वक्त में ही होते सब अपने यहाँ,

वक्त नहीं तो मतलबी होती दुनिया यहाँ।


जब मुझे ज़रूरत है, कोई पास नहीं।

जब ज़रूरत होगी मेरी, तब आयेगा ये पल भी याद किसी को याद नहीं।

जानते हुए भी चुप हैं फिर भी,

बस देख रहे तमाशा, बन के अजनबी हम भी।

ज़रूरत में सब छोड़ जाते लोग उसी हाल पे,

जो रहते  वो भी होते बस नाम के।


फिर भी है ज़िद है कुछ पाने की,

देखते हैं कब तक चलती है हम पर मनमानी बेकार ज़माने की।

कौन किसका अपना है ये वक्त बताता है।

फरेबी लोगों के बीच कौन अपना साथ निभाता है।

वक्त वक्त का खेल है सब,

वरना कौन कितना किसको सह पाता है।

इसीलिए तो वक्त के भी खेल निराले, साथ हो तो ज़िन्दगी बना दे।।।     


                 (प्रिया मिश्रा)

ज़िन्दगी का संसार।

ना जाने कैसा कर्मों का संसार निकला,

जिसे चाहा उसी सफलता का गुनहगार निकला।

कुछ बातें बुरी लगती है मुझे अपनी ही,

क्या सोचा क्या पाया सब बेकार निकला।


सोचा था कभी गिरना नही है,

पर कुछ और हरबार निकला।

सोचा था कहना हूं मैं भी कुछ,

ये शब्द ही सारा नाकाम निकला।

नाम कैसे बनाऊं मैं  खुदका? 

कांटे की तरह इस बात का अंजाम निकला।

समझने में देर कर दी पर कोई बात नहीं,

कमी रही, तो मेहनत का तराना भी बेकार निकला।

अरमान सजाया सफलता का मैंने ज़िन्दगी में,

समझ नहीं आता कर्म बुरा या किस्मत का खाली आसमान निकला।

मैं तो कुछ हूँ ही नहीं, बस एक नमूना जिसकी प्रयास उसी पर भारी हैं।


मन आया कर्मप्रधान हो जाते हैं,

मन आया सपनों में ही खो जाते हैं।

अजीब अजीब से मंज़र हैं हालातों के भी,

हर बात के अपने ही नज़ारे हैं।

जिससे डरता  है मन सोचकर ही,

उस असफलता के लिए क्यों कर्म बनाएं हैं।

जब मेहनत से खुश हूँ, तब क्यों आलस्य के नज़ारे हैं।

 अकेले में एक बात ही आती है फिर भी,

जाने कैसा संसार निकला,

 जिस सफलता को चाहा कभी,

 उसकी मैं या वो मेरी हार निकला। 

                                   (प्रिया मिश्रा)

बस्तियों में रह आना।

By Priya Mishra in Hindi, Poetry


कभी वक्त मिले तो बस्तियों में रह आना।

 

तम्बू लगाकर बारिश में,

तुम कुछ दिन ठहर कर आना।

थोड़ी सी जगह में पूरा परिवार रखना,

बिन पैसों के जीवन की चाह रखना।

लकड़ियां इकट्ठी कर स्वयं से

तुम भोजन का जुगाड़ करना।

 

ठण्ड में बिन कपड़ों के कभी रात बसर कर आना,

कभी वक्त मिले तो बस्तियों में रह आना।

 credit: third party image reference


नालियों की गंध, कीड़े- मकोड़ों संग,

कुछ साथ निभा आना।

बीमारी के साये में हरपल जीते दो पल की

खुशियां बना आना।

 

जो मिला वह बेहतर है,

ये पाठ ज़रा पढ़ आना।

ज़रूरतमंद की मदद में तुम खुद को जिता आना,

कभी हार मान जाओ तो बस्तियों में रह आना।

 


एक दिन का जीवन बिताकर देखो,

यदि कर पाओ तुम ऐसा तो

जीवन का तुम शुक्र मना आना,

हाथ बढाकर थोड़ा सा तुम प्यार बांट कर आना।

 

अभाव के साथ भी जीते हैं वे,

हरपल में डर को लिए हुए।

टुकड़े-टुकड़े को तरस रहे,

अर्धनग्न से पड़े हुए।

 

ना शिक्षा ना ज्ञान यहां,

हरपल है अपमान यहां

कौन अपना कौन पराया,

कौन दे किसका ध्यान यहां।

 

दर्द महसूस कर तुम स्वयं से उनका,

उनके प्रति थोड़ा सम्मान जगा आना।

जी कर उनका जीवन तुम,

अपने से नीचे का मान समझ आना।

 

दबे लोगों में एक आस जगा आना,

वक्त मिले तो बस्तियों में रह आना।

कुछ कर ना सको तो प्यार से

बोल के शब्द सीख आना।

कर इनके काम का सम्मान

इंसानियत का द्वीप जगा आना।

 

कभी वक्त मिले तो बस्तियों में रह आना।

                         (प्रिया मिश्रा)

रिश्ता इंसानियत का।

मौत के बाद ज़िन्दगी को किसने देखा है।

दफन हो रहा या घिरा अग्नि की लपटों में,

मृत शरीर ये कहाँ जान पाया है।


किस धर्म के हो क्या मजहब है तुम्हारा ये क्यों जानना है?

रिश्ता तो ऊपरवाले ने बस इंसानियत का बनाया है।

हर मजहब ने सबका मालिक एक का ही हिसाब बताया है,

हर जान को उसने ही बनाया है।


माना अपना धर्म और अपना तरिका है इबादत का सबका,

फिर भी हाथ तो इबादत में सबने ऊपर ही उठाया है।

बात कुछ भी हो, सच्चे धर्म के पुजारी को लड़ना कहीं ना आया है।

मजहब के नाम पर अपनों के बहते लहू से भला कौन सा खुदा खुश हो पाया है।


अपना रिश्ता इंसानियत का है, हर इंसान में भगवान समाया है,

अपने पराये के दलदल से निकलकर तो देखो हर शक्श में उसी की छाया है।

हरपल में खुशियां है हरपल में ग़म ऐसा है सभी का संसार यहाँ,

भेदभाव की छाया छोड़ो, एक जैसा ही सबका सम्मान यहाँ।।

मजहब के नाम पर लड़ाइयाँ बन्द करो क्योंकि सबका है मान यहाँ।।

सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का, यही नाम ज़िन्दगी का।

                                                    (प्रिया मिश्रा)

प्रथा जातिवाद की।

प्रथा कुछ ऐसी चली जातिवाद की,

भेदभाव के श्रंगार की,

ह्रदय के बँटवारे की।

कट्टर होती नाम मजहब के,

मुस्लिम, ईसाई, सिक्ख, हिन्दू के नाम पर फैलते नारों की।

हर शहर हर डगर में होते विवाद की,

प्रथा कुछ ऐसी चली जातिवाद की।


ऊँच नीच फैलाने की,

व्यक्तियों के अपमान की,

बढ़ते आतंकवाद,

और हो रहे नरसंहार की।

लोगों के बीच फैली अनैतिकता,

इंसानों द्वारा इंसानो के ही दुर्व्यवहार की,

प्रथा कुछ ऐसी चली जातिवाद की।


कलंक हैं वो इंसानियत पर,

लगाया ना मरहम जिसने अपनों के ज़ख्मों पर।

 ईमान को भूल जो,

ऐसे जिए ऐसे ही मरेंगे पर बनेंगे नहीं इंसान वो।

इंसानियत नाम की चीज़ नहीं,

बनी ऐसी दुर्दशा है संसार की।

प्रथा ऐसी एक जातिवाद की।

लोगों को देखा मैंने रंग बदलते,

हिंसा फैला कर कटते और मरते।

आने वाला कल ना जाने कैसा होगा,

एकता की मिसाल और महान बनेगा या इस प्रथा की बलि चढ़ेगा।

प्रथा ही ऐसी बनी इस जातिवाद की,

सम्मान के लिए ही पैदा हुई कहानी असम्मान की।.  


                                       (प्रिया मिश्रा)

भविष्य के भारत में अधिकारों की लड़ाई की समाप्ति की कल्पना के साथ।

 By Priya Mishra in HindiSociety

एक विकासशील देश है तथा इसे विकसित बनाने हेतु सरकार तेज़ी से कार्यरत है। जहां एक ओर आज भारत में तकनीकी बढ़ाने, डिजिटल बनाने और देश की इकॉनोमी को 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर बनाने का उद्देश्य है। वहीं एक सवाल हर भारतीय के मन में होगा कि उसे अपना भविष्य का भारत कैसा देखना है?

मेरे विचार से मेरे भविष्य के भारत का सपना बहुत ही चुनौतीपूर्ण है। किंतु यदि हम सभी मिलकर प्रयास करें, तो इसे साकार किया जा सकता है।

आज भारत को विकसित देशों में शामिल करने हेतु तेज़ी से प्रयास किये जा रहे हैं। डिजिटल इंडिया तथा मेक इन इंडिया के तहत अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने व रोज़गार पैदा करने के प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन, वहीं कुछ ऐसी बातें भी हैं, जिनका सीधा असर हमारे रहन-सहन के सुधार को लेकर है। विश्वगुरु बनने की राह पर अग्रसर अपना भारत कैसा होना चाहिए इस पर कुछ निम्न बातें महत्वपूर्ण हैं।

रूढ़िवादी मान्यताओं का अंत

तरक्की की ओर कदम बढ़ाते अपने देश में कुछ जगहों पर पुरानी प्रथाओं के नाम पर कई ऐसी रूढ़िवादी मान्यताएं हैं, जिन्हें बदलना आवश्यक है। जैसे, उदाहरण के लिए यदि देखा जाए तो छुआछूत की प्रथा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ये प्रथाएं बड़े शहरों में भले ही देखने को ना मिलती हों लेकिन मध्यप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ जैसे इलाकों में आज भी ये वैसी ही चलती हुई दिखाई देंगी।

मैंने बचपन से इस प्रथा को खुद के घर में भी अपनाते हुए देखा है। इसी तरह की अन्य कई ऐसी रूढ़िवादी मान्यताएं हैं जो अपने भविष्य के देश में समाप्त होनी चाहिए। ताकि इन विचारधाराओं का असर आने वाली पीढ़ी पर ना हो सके और इसके कारण किसी को हीनभावना का शिकार ना होना पड़े।

लिंगभेद की समाप्ति

देश में कई स्थान ऐसे हैं जहां लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। एक सर्वे के अनुसार लड़कियों की संख्या सरकारी स्कूलो में और लड़कों की संख्या प्राइवेट स्कूलों में सर्वाधिक पाई गई। जिसका सीधा सा यही मतलब है कि आज भी लड़कियों पर लड़कों की अपेक्षा कम खर्च करने की मान्यता व्याप्त है।

इसके अलावा महिलाओं को अक्सर पुरुषों की तुलना में कमज़ोर समझा जाता है, जिसकी वजह से अधिकतर महिलाये स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पातीं। इसके अलावा छोटे प्रदेशों में इसी भेदभाव के कारण महिलाओं पर अत्याचार होते रहे हैं, जिसमें दहेज़ प्रताड़ना, घरेलू हिंसा इत्यादि बातें शामिल हैं।

इसके अलावा अधिकतर महिलाएं इन अत्याचारों को अपना कर्म मानते हुए सहती रहती हैं तथा बदनामी के डर से चुप रह जाती है। समाज को नए आयामों तक ले जाने हेतु लिंगभेद की समाप्ति की जानी चाहिए।

महिलाओं के अलावा एक अन्य समाज भी हैं, जो संघर्षों की लड़ाई में लगातार जूझता रहा है। हमारा समाज जिन्हें किन्नरों के नाम से जानता है, समाज में उनका भी स्थान है। लिंग के आधार पर उनसे भेदभाव के कारण उन्हें समाज से अलग कर दिया जाता है, जिसकी वजह से वे मांग कर खाने को मजबूर होते है।

इस लिंग में जन्म लेने वाले बच्चे को उसी के माता पिता द्वारा त्याग दिया जाता है और अकेले लड़ने को छोड़ दिया जाता है। भले ही अब धीरे-धीरे हम इस सोच से आगे बढ़ रहे हों लेकिन अपने भविष्य के भारत में मैं इन भेदभावों को पूर्णतः खत्म होता हुआ देखना चाहती हूं, ताकि हमारे समाज का ये वर्ग भी सामान्य नज़रों से देखा जा सके और इन्हें भी बराबरी का हक मिले।

जातिवाद की समाप्ति

जाति के आधार पर कट्टरता को समाप्त कर कर्मों के आधार पर व्यक्ति मूल्यांकन किया जाना चाहिए। जाति आधारित बंटवारे के कारण आज हम सभी एक होकर भी अलग-अलग वर्ग और समाज में बंटे हुए हैं, जिसका असर लड़ाई दंगों के रूप में देखना पड़ता है।

जातिवाद की समाप्ति के साथ ही ऊंच-नीच, इत्यादि के कारण होने वाली लड़ाई समाप्त होने के बाद ही भाईचारे की शुरुआत होगी।

शिक्षा का विकास व रोज़गार

शिक्षा का स्तर किताबी ज्ञान ना होकर व्यवहारिक होना चाहिए। हर बच्चे को उसकी रूचि के अनुसार ज्ञान मिलना चाहिए ताकि वे एक क्षेत्र में बेहतर होते हुए नवीन भारत को नई दिशा प्रदान कर सके।

गरीबी मुक्त भारत

काम छोटा हो या बड़ा, अपने सामर्थ्य के अनुसार हर व्यक्ति कार्यशील हो तथा गरीबी के कारण कोई भी संसाधनों से वंचित ना रह जाए तथा अमीरी गरीबी के मायाजाल से समाज का छुटकारा हो सके।

भ्र्ष्टाचार मुक्त भारत

भारत को एक भ्र्ष्टाचार मुक्त देश बनाया जाना चाहिए, जिसके लिए आवश्यक है कि हम स्वयं से शुरुआत करें और भ्रष्टाचार मुक्त भारत की कल्पना करें।

India flag people FB

अधिकारों की लड़ाई समाप्त हो और कर्तव्यों का निर्वहन हो

सर्वाधिक महत्वपूर्ण एक विचार यह है कि हमारे अपने भारत से अधिकारों की लड़ाई की समाप्ति होनी चाहिए और समाज को कर्तव्यों के निर्वहन पर ज़ोर देना चाहिए। हम सभी को सिखाया गया है कि अपने अधिकारों के लिए लड़ो, परंतु इसके साथ ही यदि कर्तव्यों के निर्वहन पर भी ज़ोर दिया जाए और कर्तव्यों की शिक्षा दी जाए तो हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए कार्य करेगा और अधिकारों की लड़ाई स्वतः ही समाप्त हो जायेगी।

इन सभी बातों के अलावा देश प्रदूषण मुक्त, सिंगापुर जैसे स्वच्छ्तापूर्ण और रोगमुक्त हो। इन सभी बातों के साथ अपने संस्कार और संस्कृति से विश्वविख्यात हो ऐसे भारत की कल्पना करती हूं।

जब गुलाम थे तो अहिंसा से देश जीता, आज आज़ाद हैं तो हिंसा से देश गंवा रहे हैं

महात्मा गाँधी के अहिंसा से युक्त उनके सभी स्वतंत्रता हेतु लड़े आंदोलन देश की स्वतंत्रता में अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन आज सवाल यह उठता है कि क्या आज भी अहिंसा के बल पर देश में बदलाव लाए जा सकते हैं?

मेरे हिसाब से जब इतने बड़े-बड़े स्वतंत्रता आन्दोलनों को अहिंसा के माध्यम से ना सिर्फ लड़ा गया, बल्कि हमारी जीत भी हुई, तो आज जब हम पूर्णतः स्वतंत्र देश के नागरिक बन चुके हैं तो हमें अपनों से ही हिंसात्मक व्यवहार करने की क्या आवश्यकता है?

हमने कई लड़ाईयां अहिंसा के रास्ते से जीती

देश में कई ऐसी समस्याएं हैं, जिनका समाधान करने हेतु सबके अपने विचार होते हैं, किन्तु उन विचारों को शान्तिपूर्ण ढंग से विरोध करते हुए भी रखने की हमें आज़ादी मिली हुई है। बसें जलाना आग लगना हिंसात्मक व्यवहार करना कहां तक सही है? हम अपने विचार रखने के अधिकारी हैं, बहुमत होने पर हमें प्राथमिकता दे दी जायेगी। ऐसे में अपने विचार को किसी अन्य पर थोपने में कहां समझदारी है?

अभी हाल ही में लागू NRC और CAA बिल पर लोगों से लेकर पुलिसवालों ने दंगे शुरू कर दिए, चक्का जाम से लेकर हिंसा। जो-जो वे कर सकते थे, उन्होंने किया। लेकिन क्या किसी ने यह सोचा कि वे ये सब आखिर किसके साथ कर रहे हैं?

बिल सरकार ने पास किया, बात हमें सरकार से करनी है। धरना प्रदर्शन इत्यादि हमें उनके लिए करना था। पर हिंसा किसपर हुई? अपनों पर, जब देश हमारा है तो इसके निवासी भी तो अपने हैं?

इन सभी के पीछे आखिर क्या वजह है कि आज जब सही मायनों में अहिंसात्मक ढंग से अपनी बातों को रखा जाना चाहिए और देश में बदलावों की ओर मिलकर कदम बढ़ाने चाहिए, तब उस स्थिति में आखिर यह हिंसात्मक व्यवहार और अपनों में ही भेदभाव क्यों किया जा रहा है?

आज होती हिंसा के क्या कारण है?

इसके पीछे कारण यदि मेरे विचार से कोई है तो वह है कर्तव्यों को भूल केवल अधिकारों की लड़ाई लड़ने पर ध्यान देना। अपने देश में जहां पुराने समय में कर्तव्यों के निर्वहन पर ज़ोर दिया जाता था, वहीं आज हर समय केवल अपने अधिकारों हेतु लड़ना सिखाया जाता है। मैं यह नहीं कह रही कि अधिकारों के लिए लड़ना गलत है। किंतु अधिकारों हेतु लड़ने के साथ ही स्वयं को सक्षम बनाना और अपने कर्तर्व्यों का निर्वहन भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है।

क्या इन सभी मुद्दों का निवारण बिना हिंसात्मक हुए नहीं किया जा सकता था? सरकार को लगता है कि वह जो करे यह उसका अधिकार है। जनता सोचती है हमारे समुदाय का हनन ना हो यही हमारा अधिकार है। जबकि सही मायनों में जनता का कर्तव्य है कि वह केवल अपने समुदाय के विषय में ना सोच संपूर्ण देश के विषय में सोचें और सरकार का कर्तव्य है कि किसी भी ऐसे विचार जिसमे सम्पूर्ण देश का कल्याण शामिल है, उसमें जनता के विचारों को भी अहमियत दी जाए।

यदि यही कार्य बहुमत के आधार पर होता, तो शायद देश में इतने दंगे ना हुए होते। आज का ज़माना बदल रहा है। डिजिटल युग में पोल के माध्यम से भी अपनी बातों का समर्थन किया जा सकता था। किंतु इस अधिकार की लड़ाई में हमने कर्तव्यों को पूर्णतः दरकिनार कर दिया है।

अपनों के साथ ही हिंसा कर रहे हैं

हमें इस बात का ज़रा भी आभास नहीं होता कि आखिर यह हिंसात्मक व्यवहार हम किसके साथ कर रहे हैं? क्या जिन लोगों के साथ हिंसा की जा रही है, वे अपने देश के निवासी नहीं थे? क्या वे कहीं बाहर से आये हुए लोग थे? हमें अपनों को तकलीफ में देख दुःख होता है। हम अपने समुदाय के लिए लड़ना चाहते हैं लेकिन क्या जिनसे हम लड़ रहे हैं, वे अपने ही देश के निवासी, अपना ही समुदाय अपना ही परिवार नहीं हैं?

अपने देश से बाहर निकलने पर हम क्या कहलाते हैं? मुस्लिम? ब्राम्हण? सिख? नहीं। हमारी nationality हिन्दू है। हम हिन्दू कहलाते हैं। जिसका अर्थ होता है भारत के निवासी। भारतवासी।

जब बाहर हम अपने देश की शान हैं, तो अपने घर के अंदर हम अलग-अलग क्यों हैं? हमारे परिवार का नाम भारत है और इसके अंदर के सदस्य अलग अलग धर्म हैं। जैसे बुआ भाई बहन दादा दादी होते हैं, ठीक उसी प्रकार। जैसे परिवार में इंसान हर बात पर अलग-अलग विचार रखता है, सभी एक बात से सहमत नहीं होते, ठीक इसी प्रकार देश के अंदर हर कोई हर विचार से सहमत हो सही नहीं है।

लड़ाइयां तो चलेंगी, विवाद भी होंगे, पर जिस दिन हम इन विवादों को पारिवारिक मुद्दों की तरह हिंसात्मक ना होते हुए अहिंसात्मक रूप से रखना शुरू कर देंगे, भले ही कोई सहमत हो अथवा असहमत, फिर भी ये विवाद स्वतः समाप्त होने लगेंगे।

ज़िम्मेदारी के बोझ से मासूमों पर प्रहार “बाल विवाह।

आधुनिकता के साथ कदम मिलाते हुए एक तरफ देश जहां तरक्की करते हुए चांद तक जा पहुंचा है। जहां एक तरफ युवाओं को आगे लाने एवं सजग बनाने हेतु सरकार तेज़ी से कार्यरत है। वहीं समाज में फैली कुछ कुरीतियां देश के कुछ हिस्सों में बच्चों से उनका बचपन छीनने का कार्य कर रही हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही महिला एवं बाल कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी ने राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में बाल विवाह से जुड़े पांच वर्षों का आंकड़ा प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार ऐसे मामलों की सर्वाधिक संख्या वर्ष 2017 में थी, जब 395 ऐसे विवाह हुए इन्ही कुरीतियों में एक बाल विवाह भी है। जिसके मुख्य कारण निम्न तबकों में शिक्षा का अभाव, समाज में फैली रूढ़िवादी सोच, अंधविश्वास तथा निम्न आर्थिक स्थिति और गरीबी है। बाल विवाह समाज में फैला एक ऐसा अभिशाप है जिसकी वजह से 18 वर्ष से कम उम्र के उन सभी बच्चों पर जो इसका शिकार होते हैं, उनके मानसिक तथा शारीरिक विकास को बुरी तरह प्रभावित करता है। बाल विकास के कारण कम उम्र में गर्भधारण से माता एवं शिशुओं में कुपोषण, शिशु- माता मृत्यु की संभावना अधिक तथा कम उम्र में पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ आने से मानसिक तनाव, गरीबी जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। स्वयं को संभालना सीखने की उम्र में शिशुओं और परिवार की जिम्मेदारियों के चलते शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं बचपन तीनों ना जाने कहाँ गुम से हो जाते हैं। दुःख की बात तो यह है कि ऐसा स्वयं उन बच्चों के माँ बाप करते हैं, जिनके साथ यह बीत चुका होता है। सबकुछ जानते हुए अपने बच्चों को उसी प्रकार कष्ट देना वो अपना धर्म मानने लगते हैं। अपनी बेटियों को बोझ मान कर माँ बाप उन्हें विदा करना अपना फर्ज समझते हैं। मैंने सुना है कि कुछ जगहों पर ऐसी भी मान्यता होती है कि माहवारी के पहले कन्यादान शुभ होता है। जिस वजह से 14 वर्ष से भी कम उम्र में वे इस पुण्य को प्राप्त करने हेतु अपनी बेटी को बलि का बकरा बना देते हैं। कई जगहों पर कम उम्र की लड़कियों को उनसे 10 साल बड़े लड़कों के साथ ब्याह दिया जाता है,उसके पीछे उनका कारण भी केवल गरीबी के चलते किसी तरह बेटी विदा करना होता है। बाल विवाह केवल लड़कियों के लिए अभिशाप है ऐसा कहना गलत होगा। क्योंकि लड़के भी पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते मानसिक तनाव में आ जाते हैं। कम उम्र में ही पति और पिता बनने के बाद उनसे बालपन त्याग वयस्क बनने की उम्मीद की जाती है, जो की उन्हें अंदर से खोखला कर सकता है। जल्दी विवाह बच्चों को शिक्षा से वंचित कर रूढ़िवादिता की ऒर धकेलता है। प्रथा के नाम पर इन कुरीतियों के कारण लोग अपने ही बच्चों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे होते हैं इस बात का उन्हें ज़रा भी आभास नहीं होता। देश को आगे बढ़ाने तथा युवाओं को सजग बनाने हेतु यह आवश्यक है कि इस प्रथा का अंत किया जाय। हालांकि वर्तमान में बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 द्वारा बाल विवाह को सख्ती से प्रतिबंधित करने का प्रयास 2007 से किया गया है। जिसके तहत 18 वर्ष की उम्र के पश्चात 2 वर्षों के भीतर यदि व्यस्क चाहे तो अपने बाल विवाह को अवैध घोषित कर सकता है। किन्तु यह कानून मुस्लिमों पर लागू नहीं होता जो की इसकी बड़ी कमी है। इसके अलावा यह कानून इस कुरीति को जड़ से मिटाने में कारगर नहीं है जिस वजह से हमें इसके लिए कुछ अन्य कदम उठाने चाहिए। बाल विवाह रोंकने हेतु अन्य उपाय जो किये जाने चाहिए:- बाल विवाह को समाज में जागरूकता फैलाकर ऐसे क्षेत्रों जहाँ यह फैला हुआ है के लोगों को इसके दुष्परिणामों से अवगत कराना, शिक्षा के प्रसार द्वारा वहां के बच्चों में कुछ करने की चाह जगाना, माता-पिता को उनके बच्चों के प्रति सजग बनाकर इसे रोका जा सकता है। इसके बाद भी ऐसा कुछ ना हो इसके लिए कानूनों को सख्त करना चाहिए। जिसमें बाल विवाह की सुचना मिलने पर दोनों पक्षों पर जुर्माना, तथा कानूनी कार्यवाही के प्रावधान होने चाहिए। इसके अलावा विवाह certificate आवश्यक करके जिसमें 18 वर्ष से पूर्व को certificate से वंचित कर तथा 18 वर्ष से पूर्व हुए विवाह को अमान्य घोषित कर लोगों में ऐसा करने के दुष्परिणामों के चलते लोगों में डर पैदा किया जा सकता है। ताकि वे स्वयं ऐसा करने से बचें।

रिश्ता इंसानियत का।

स्वतंत्रता दिवस के रोज़ पास वाले स्कूल में फूहड़ गाने बज रहे थे

By Priya Mishra  in  Hindi ,  Society “गणतंत्र दिवस के रोज़ पास वाले स्कूल में फूहड़ गाने बज रहे थे” स्वतंत्रता दिवस के रोज़ अपने घर पर बैठे...